मंगलवार, 31 मार्च 2015

धारावाहिक का नकारात्मक पक्ष

टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले धारावाहिकों ने समाज को भ्रमित करने का कार्य भी बड़ी चतुराई के साथ किया है हमारे देश मे जिस गति से पाश्चात्य सभ्यता ने अपने पाँव पसारे है उसका जिम्मेदार कुछ हद तक टीवी भी हैं । आज लड़कियों के चेहरे पर लाज व घूँघट के बदले मेकअप ने जगह ले ली हैं इन सब में धारावाहिकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही हैं। आज मनोरंजन करने के लिए डी जे और डिस्को का प्रचलन आ गया हैं जबकि पहले लोग गुजराती गरबा, पंजाबी भगंडा करके अपना मनोरंजन करते थे ।
इसमें कोई दो राय नही है कि टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले हिन्दी धारावाहिकों ने समाज की हर इकाई पर प्रभाव छोड़ा हैं । समाज की बदलती सोच का कहीं न कहीं जिम्मेदार टीवी भी हैं । टेलीविजन आज पागल हाथी की तरह सब कुछ उखाड़ रहा है जिसे हमने बहुत समय से बचाकर रखा था वो उन सभी संस्कृति को तोड़ने मे लगी हुई हैं । उसके इस प्रभाव के कारण आज भारतीय समाज दिन के उजाले में भी किसी अंधकार की तरफ गुम होता जा रहा हैं इसका अर्थ यह हुआ कि धारावाहिक निर्माताओं को नैतिकता से नही बल्कि अपनी जेबें भरने से मतलब होता हैं ।
टीवी की ताकत लगातार बढ़ती ही जा रही हैं ,टीवी समाज में रहने वीले हर वर्ग को छुता है । चाहे वो बच्चा हो, महिलाएँ हो, युवाओं को, अपराधियों को, वैश्याओं को, बुजुर्ग आदि ।          टेलीविजन का समाज पर प्रभाव देखना हो तो दर्शक के बदलते व्यवहार और जीवन शैली ,में देखा जा सकता हैं.। आज हर कोई धारावाहिकों में अभिनय करने वाले अभिनेता ,अभिनेत्रियों की तरह रहना , बोलना तथा कपड़े पहनना चाहते हैं उनकी बनावटी बातों और मूल्यों को सच मानने लगी हैं । वह यह नही जानती कि यह मूल्य धारावाहिक को दिशा देने के लिए निर्माता द्वारा बनाया जाता हैं जो केवल देखने में ही अच्छा लगता हैं क्योंकि इस तरह का जीवन रीयल लाईफ में जीना संभव नही हैं ।
टेलीविजन का नकारात्मक प्रभाव सबसे ज्यादा बच्चों पर ही देखने को मिलते हैं ,आजकल टीवी के कारण बच्चे फैटंसी की दुनिया में रहने लगे हैं। बालवीर, सोनपरी, शक्तिमान , शाका-लाका बूम बूम, विकराल और गबराल, हातिम, अलिफ लैला आदि ऐसी धारावाहिकें बच्चों को ऐसे चरित्रों से मिलाता हैं जो काल्पनिक हैं और बच्चों के कोमल ह्रदय और मस्तिष्क पर प्रभाव डालते हैं।
कुछ बच्चें जहाँ धारावाहिकों में दिखाये गए घटनाओं को सच मानकर अपने जान से हाथ धो बैठे हैं उदाहरण के तौर पर शक्तिमान को देखते हुए कई बच्चों ने ठीक उसी प्रकार किया जैसे कि उसके अंदर दिखाया जाता हैं ,कुछ बच्चों ने अपने शरीर पर मिट्टी का तेल डालकर आग लगा ली और शक्तिमान का इंतजार करने लगे उन्हे पूरा भरोसा था कि शक्तिमान उन्हें अवश्य बचा लेगा और इसी चक्कर में वह अपने जान से हाथ धो बैठे । ये तमाम उदाहरण नकारात्मक प्रभाव के उदाहरण ही हैं ।
बच्चों का चिढ़चिढ़ा और अवज्ञाकारी होने में भी टीवी का ही  हाथ हैं, वह कम से कम 4-5 घंटे टीवी देखते हैं जिस कारण वह पढ़ाई पर पूरा ध्यान नही दे पाते न ही अपना गृहकार्य पूरा कर पाते है । वह विज्ञापनों को रट लेते है ,किताबो के चैप्टर्स से ज्यादा उन्हें धारावाहिकों और उनके चरित्रों के नाम याद होते हैं । वह टीवी देखकर अपनी आँखे भी खराब कर लेते हैं जो कि बाद में उनके भविष्य के लिए नुकसानदेय साबित होता हैं ।
अपराध के बढ़ने का कारण भी कहीं न कहीं टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले धारावाहिक हैं । सी आई डी, अपराधी कोन, सावधान इंडिया, क्राईम पैट्रोल आदि जैसे धारावाहिक कही न कही मनोरंजन के साथ – साथ जाने-अनजाने अपराधियों को अपराध करने के नए-नए तरीकों तथा योजनाओं से अवगत कराता हैं ।

यह विवेचना टीवी पर प्रसारित होने वाले औसत से ज्यादा प्रसारित होने वाले धारावाहिकों को आधार पर रख कर ली गई है परन्तु आज भी कुछ धारावाहिक ऐसे है जो सामाजिक दायित्वों को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं।

धारावाहिक का सकारात्मक पक्ष

टीवी पर प्रसारित होने वाले धारावाहिकों ने समाज के हर वर्ग पर असर डाला हैं। इन धारावाहिकों ने नारी की पंरपरावादी छवि को तोड़ा हैं ।आज महिलाएँ, ज्यादा सर्तक, सजग व अपने अधिकारों के लिए जागरूक हुई हैं । इसका मुख्य कारण टीवी पर प्रसारित होने वाले शांति, कुमकुम, अस्तित्व, मधुबाला आदि धारावाहिकों की वजह से आज लड़कियों के चेहरे लाज शर्म के मारे नही दिखते । इन धारावाहिकों के माध्यमों से स्त्रियों के कई रूपों को दिखाने का प्रयास किया जाता रहा हैं ।
जिसके अंतर्गत वह हर क्षेत्र में पुरूषों के मुकाबाले ज्यादा सक्षम हैं उसके अंदर जूनून ,आत्मविश्वास कुछ करने की ललक साफ तौर पर देखा जा सकता है । वह अफसर हैं , सेल्फ रिप्रेजेटेटिव हैं, पत्रकार हैं, वकील हैं,  सिर्फ टीचर या नर्स नही हैं । टीवी पर ऐसी स्त्रियों को लगातार दिखाने से मर्दों के आगे स्त्री की उपस्थिति बढ़ी हैं । इससे नया स्त्रीत्ववादी विमर्श पैदा हुआ है और मर्दों की बनाई मर्यादावादी दुनिया में त्राहि – त्राहि मचनी शुरू हुई हैं । कुछ वक्त पहले तक स्त्री अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों को बताने से डरती थीं चाहे वो बल्तकार हो या कुछ और ,स्त्रियां इसे छिपा लेती थीं ।
अब वह टीवी के सामने मुँह खोलकर बताती है स्पष्ट है कि वह बेखौफ हुई हैं इन सबका एक कारण टीवी पर प्रसारित होने वाली धारावाहिक भी हैं । अब वह आधुनिक लड़की हमें गली, मुहल्ले हर जगह देखने को मिल रही हैं जिसको कुछ समय पहले तक ढूँढ़ना आसान नहीं था । इस नई लड़की को टीवी ने बनाया हैं वह अधिक सचेत और प्रदर्शन प्रिय हैं । वह अपने छवि के प्रति अधिक चिंतित हैं । कास्मेटि उधोग, अपने हक और बराबरी का दावा करने वाली कहानियों ने उसे बनाया हैं । वह महाभारत, रामायण, श्री कृष्ण को देखकर सती अनुसूया नही बनी हैं, उनकी रोल माँडल कैटरीना, करीना व प्रियंका चोपड़ा जैसी अभिनेत्रियाँ रही है वह उनकी तरह ही बनना चाहती हैं ।
टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले धारावाहिकों का सकारात्मक असर पुरूषों पर भी हो रहा हैं । वह हैल्थ फ्रिक हुए हैं । उन्हे गुड हैल्थ शो, माई जिम जैसे धारावाहिक लुभाते हैं।वर्तमान समय के धारावाहिकों में जिस प्रकार से पुरूषों के चरित्र तथा फिटनेस को फोकस कर दिखाया जाता हैं वह भी पुरूषों को अपने प्रति जागरूक होने का कार्य करता है ।
टीवी का सबसे ज्यादा असर ग्रहण करने  वाला वर्ग बच्चों का ही हैं । बच्चों का मस्तिष्क व ह्रदय दोनों ही कोमल होते है। उन पर टीवी पर प्रसारित होने वाले धारावाहिकों का असर जल्द ही हो जाता हैं। उदाहरण के लिए अगर माँ ने बच्चे से कहा कि दूध ,पानी हमारी सेहत के लिए अच्छा है तो कोई असर नही पड़ेगा परन्तु यहीं बात अगर शक्तिमान टीवी में कहेगा तो दुध को पंसद न करने वाले बहुत से बच्चो को दूध अच्छा लगने लगेगा ।
टीवी पर प्रसारित होने वाले धारावाहिकों की वजह से वह अपनी जरूरतों की चीजो को पहचानने लगे हैं आज वह बालवीर बनना चाहते है । वह बालवीर बन सकते है इस बात का आभास उन्हे टीवी ही कराता हैं ।
टीवी ने उन समाजों को ताकत का एहसास कराया है जो परंपरागत समाज से बाहर कर दिए गए थे । इसमे दलित और स्त्रीं जैसे वर्ग शामिल हैं टीवी घरेलू मामला है जो यह एहसास कराता है कि जो आप देख रहे है वह आपका जीवन है इसलिए उसे देखते हुए दर्शक उसकी छवियों जैसा बनना चहता है। टीवी कामना को खोलने और निर्बध करने वाला माध्यम हैं । जब एक दलित अपने यहाँ टीवी देख सकता है और वही सब कुछ देख सकता जो उच्च जातियाँ देख रही है ।
टीवी के प्रभाव के कारण ही आज सूचनाओं का तेजी से विस्तार हो रहा हैं समाज की जरूरत हैं सूचना , सूचना के माध्यम से ही समाज का विकास किया जाता हैं । आज भारतीय समाज में अस्थिरता का बड़ा कारण और गणतंत्र के बने रहने वाले का भी एक बड़ा कारण टीवी को कहा जा सकता हैं। अब न्याय सहने वाले कम हो रहे हैं, अन्याय के खिलाफ लड़ने वाले ज़्यादा हो रहे है । आज लोगों को न्यायपालिका और कार्यपालिका से ज्यादा भरोसा टेलीविजन पर हैं ।
हम देखते है राजनीतिक एंव आर्थिक सूचनाओं के लिए अखबार था, मनोरंजन के लिए सिनेमा था, निजी बातचीत एंव व्यपार के लिए टैलिग्राफी और टेलीफोन थे । लेकिन आज इन सबका स्थान टेलीविजन ने आसानी से ले लिया है या यू कहें कि इन सब कार्यों को टीवी अकेले ही करता हैं । टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले धारावाहिक के कारण ही सैक्स के प्रति युवाओं का नज़रिया बदला हैं । एड्स सूचना कार्यक्रमों , कोंडम सैनिटरी नैपकिन के विज्ञापन ने युवा वर्ग के दृष्टिकोण बदल दिया हैं । वे अपने दोस्तो से प्रेम के बारे में अधिक खुलकर बात करते दिखते हैं।
शिक्षा के क्षेत्र में तो टेलीविजन ने क्रांतिकारी परिर्वतन संभव किए है टीवी ने कक्षा को घर – घर तक पहुँचा दिया अब टीवी के माध्यम से घर बैठे ही पढ़ाई की जा सकता हैं । जब मार्शल मैकलूहान ने माध्यम को संदेश बताया था तो उनका मकसद शिक्षा क्षेत्र से ही था । इसके अलावा टीवी पर कुछ ऐसे भी धारावाहिक हैं जो सामाजिक कुरीतियों, सामायिक समस्याओं व पुरानी रूढ़िवादियों के संबधित विषय पर चर्चा करते है ।

हिन्दी धारावाहिकों ने कथा को छापेखाने से उठाकर , निरक्षरों के बीच लाने का काम किया हैं ,ध्यान से देखे तो उसे नया रूप , साज सज्जा, चरित्र रुपन देकर उसे नया जीवन देने का कार्य किया हैं । धारावाहिकों की लोकप्रियता ही उसकी सफलता की कहानी कहती हैं । धारावाहिकों के माध्यम से समाज ने बहुत कुछ सिखा हैं ।

सोमवार, 30 मार्च 2015

हास्य धारावाहिक की बढती मांग

टेलीविजन के लिए धारावाहिक बनाने के इच्छुक ज्यादातर लोग हास्य से संबधित अपना विषय रखना पंसद करते हैं । जो लोग पहले ही कोई न कोई धारावाहिक बना चुके है वो भी अब काँमेडी पर काम करना चाहते हैं, जो अभी सोच-विचार के स्तर पर है उन्हें भी एक विचार सबसे ज्यादा आकर्षित कर रहा है वह हैं काँमेडी धारावाहिक बनाया जाए ।
ऐसा क्यों है ? क्या काँमेडी सीरियल सबसे ज्यादा सफल होते हैं? या हास्य पर लिखना दूसरे विषयों की अपेक्षा अधिक आसान होती हैं? दरअसल ये दोनों ही धारणाएं गलत हैं तो फिर क्यों ज्यादातर लेखक, खासतौर से नए लेखक काँमेडी की ओर आकर्षित होते हैं।
इसकी वजह यह है कि हमारे यहां आमतौर पर हास्य की धारणा ही कुछ अजीब सी है। सिनेमा ने इन गलत धारणाओं को हवा दी हैं । कोई आदमी या औरत अगर ज्यादा मोटा है तो वह हमारे यहां हास्य का पात्र बन जाता हैं जबकि इतना तो सभी जानते है कि कोई जानबूझकर अपने शरीर का संतुलन अनुपात से अधिक होने नही देना चाहता । बहुत छोटा या ज्यादा लंबे कद का आदमी , हकलाने वाला ,भेंडी आंखो वाला, ऊंचा सुनने वाला ये सभी हँसी के पात्र बना दिये जाते हैं जबकि ये सभी दया और सहानुभूति के पात्र हैं।
सड़क चलता कोई आदमी अगर केले के छिलके पर पांव पड़ जाने से गिर जाता है तो इसमें हँसने जैसी क्या बात हैं? लेकिन होता यह है कि जब लोग लिखना शुरू करते हैं और हास्य के संबध में जिनकी धारणा स्वस्थ नहीं होती, उन्हें ,ही लगता है कि एक बहरे और एक हकले को बातचीत करता दिखा दो, हास्य अपने आप उपज जाएगा । यह बात शायद सही भी हो सकती हैं लेकिन उपरोक्त परिस्थितियों में दर्शकों का एक नया खास वर्ग ही हंसेगा । बाकियों को या समझदारों को उन पात्रों की उस कमजोरी के प्रति सहानुभूति होगी जो उन्हें प्रकृति से मिली है, जिसके लिए वो खुद दोषी नही हैं ।

जब आप इस तरह की भोंडी स्थितियों को हास्य के दायरे से बाहर रख कर सोचना शुरू करेंगे तो मालूम होगा कि किसी को हंसाना उतना आसान नही है जितना मालूम पड़ता हैं इसलिए यह कहा जाता है कि किसी को रूला सकना आसन है और हंसाना बेहद मुश्किल । हास्य आसन होने की धारणा इस वजह से भी बनती है कि जब किसी अन्य विषय का धारावाहिक चल रहा हो ,तब बीच में कोई समान्य सा संवाद या हास्य की कोई समान्य सी स्थिती भी हंसी का ठहाका पैदा कर सकती हैं । तब लगता हैं कि इस तरह के हांस्य संवाद तो लगातार दिए जा सकते हैं या ऐसी हास्य संबधी परिस्थिति लगातार रची जा सकती है लेकिन जब बात इस लगातार की आ जाती है , तब असलियत पता चलती हैं ।
एक के बाद दूसरी और दूसरी के बाद तीसरी,चौथी तक तो गाड़ी ठीक-ठाक चल जाती है लेकिन पांचवी के बाद जब छठी सोचना मुश्किल हो जाता है , तब लेखक के हाथ पांव फूलने लगते हैं क्योंकि उसने तो एक दो नहीं सीरीज की सीरीज देने की हामी भर रखी हैं।
इस कठिनाई के बावजूद, हास्य धारावाहिक बनते ही हैं और कुछ अपार सफल भी होते है जैसा कि हम सब टीवी पर प्रसारित धारावाहिक तारक मेहता का उल्टा चश्मा को देखते हैं जिसकी लोकप्रियता दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही हैं । इसका मतलब यह है कि हास्य के लिए लेखक में विशिष्ट पकड़ होनी चाहिए । यह सब पकड़ पैदा नही की जा सकती ,किसी हद तक कुदरती ही होता हैं । फिर भी, मेहनत से क्या नहीं किया जा सकता ? जब हास्य में स्वभाविक रूप से बहाव नहीं आता , तब उसे रचना पड़ता है। रचने का मतलब यह कि एक के बाद दुसरे संवाद में पंच आते रहे, हास्य फूटता रहे, इसके लिए सप्रयास लिखना पड़ता हैं ।
सप्रयास का मतलब , चार- पांच – सात संवाद लिखे जाये फिर देखा जायें कि कौन - सा सबसे सटीक बैठता हैं । इस तरह लिखना बड़ा परिश्रम साध्य होता है लेकिन लेखन को प्रभावशाली बनाना है तो मेहनत से बचने की बात तो सोची ही नही जा सकती । एक लाइन के पीछे चार पांच लाइनें कैंसिल करने की यह प्रक्रिया लेखक को दुविधा में डालने वाली भी होती हैं ।
कई बार यह गलतफहमी भी काम करती है कि हास्य विषय हो और अच्छे हास्य कलाकार उसमें काम कर रहें हो तो लेखक का आधा काम आसान हो जाता है क्योकि उन्हे अगर थोड़ा बहुत इशारा भी मिल जायें तो बाकी वो अपनी हरकतों और मौके पर स्वंय जोड़ दिए गए संवादों से शब्दों को सुधार कर हास्य पैदा कर सकते हैं । लेकिन यह धरणा पूरी तरह  गलत हैं । हास्य कलाकार अपने अभिनय से उन परिस्थितियों में जान फूंक सकते हैं जो कागज पर जींवत हैं लेकिन वे कुछ नहीं में से कुछ क्रिएट कर दें, यह उनके लिए मुमकिन नहीं । उनका क्षेत्र लेखन नहीं, अभिनय हैं ।
काँमेडी लेखक के तौर पर आप इस तरह का आधा-अधूरा काम करके सफल नहीं हो सकते । आप जो पटकथा टेलीविजन सीरियल के लिए लिखें, उसका एक-एक शब्द इस नजर से नापा तोला हुआ होना चाहिए कि दर्शक पर उसका क्या प्रभाव पड़ेगा । जब आप खुद उस अपने सोचे हुए प्रभाव के बारे में आश्वस्त होंगे, तभी आप निर्देशक और अभिनेता को उसमें चार चाँद लगाने का अवसर दें सकेंगें।
इस स्थिति में भी आपको दो चार होना पड़ सकता है कि जिस स्थिति को आपने परम हास्यजनक मान कर लिखा, वह एकदम सपाट निकल जायें। इसलिए जाँच परख जरा ज्यादा कड़ी होनी चाहिए । यह भी समझ लेना चाहिए कि ऐसा क्यों होता हैं? किसी जगह पर हास्य के लिए बहुत सी परिस्थितियाँ सहयोगी होती हैं । परिवार या दोस्तो के बीच हंसी खुशी के क्षणों में सभी इतने अच्छे मूड में होते हैं कि जरा-जरा सी बात पर हंसी फूट पड़ती हैं ।

ऊपरी तौर पर देखने में यह लगता हैं कि जो चीज हंसाए- वह काँमेडी । कभी हास्य कलाकार की हरकत, कभी चुटकुला , कभी गलत पहचान की वजह से उपजा हास्य ,कभी व्यंग जो आए, उसे चलाते रहो । लेकिन जब आप हास्य धारावाहिक लिखने जा रहो तो हास्य पर कुछ गंभीर विचार कर लेना आपके लिए उपयुक्त होगा । यह जानना बेहद जरूरी हो जाता है कि हास्य कितनी तरह से उपज सकता हैं, इसे आप एक वर्गीकरण के माध्यम से जल्दी तथा आसानी से समझ सकते हैं ।

.किसकी दिल्ली

दिल्ली में रहने वाले आम आदमी से लेकर ख़ास आदमी तक सभी जाम की समस्या से परेशान हैं जिनके पास खुद की गाड़ी है वो भी और रोज जो बसों में धक्के खाकर सफर करते हैं वो भी जबकी दिल्ली मैट्रों की सेवा हर 2 से 3 मिनट पर हैं और मैट्रों के अंदर जो हाल होता हैं वो हम सब अच्छी तरह से जानते हैं ...सवाल यहां पर यह हैं कि आखिर दिल्ली की अबादी दिन-दोगुनी और रात चौगुनी इतनी तेजी से कैसे बढ रही हैं आखिर रोज रेलवे स्टेशनों से लाखों लोग यहां किस मकसद से आ रहे हैं । अगर सोचा जायें तो इन सबका यहां आने का एक साफ मतलब यह हैं कि यहां वह अपने जीवन को बेहतर तरीके से जी सके ..अपने और अपने परिवार के लिए कुछ कर सकें पर क्या सभी इंसान जो यहां आते हैं वो सफल हैं । आप अपने आप से पूछिये तो शायद आप इसका जवाब जान पायेंगे ।