टीवी पर प्रसारित होने वाले धारावाहिकों ने समाज के हर वर्ग पर असर डाला हैं।
इन धारावाहिकों ने नारी की पंरपरावादी छवि को तोड़ा हैं ।आज महिलाएँ, ज्यादा
सर्तक, सजग व अपने अधिकारों के लिए जागरूक हुई हैं । इसका मुख्य कारण टीवी पर
प्रसारित होने वाले शांति, कुमकुम, अस्तित्व, मधुबाला आदि धारावाहिकों की वजह से
आज लड़कियों के चेहरे लाज शर्म के मारे नही दिखते । इन धारावाहिकों के माध्यमों से
स्त्रियों के कई रूपों को दिखाने का प्रयास किया जाता रहा हैं ।
जिसके अंतर्गत वह हर क्षेत्र में पुरूषों के मुकाबाले ज्यादा सक्षम हैं उसके
अंदर जूनून ,आत्मविश्वास कुछ करने की ललक साफ तौर पर देखा जा सकता है । वह अफसर
हैं , सेल्फ रिप्रेजेटेटिव हैं, पत्रकार हैं, वकील हैं, सिर्फ टीचर या नर्स नही हैं । टीवी पर ऐसी
स्त्रियों को लगातार दिखाने से मर्दों के आगे स्त्री की उपस्थिति बढ़ी हैं । इससे
नया “स्त्रीत्ववादी विमर्श” पैदा हुआ है और मर्दों की बनाई
मर्यादावादी दुनिया में त्राहि – त्राहि मचनी शुरू हुई हैं । कुछ वक्त पहले तक
स्त्री अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों को बताने से डरती थीं चाहे वो बल्तकार हो या
कुछ और ,स्त्रियां इसे छिपा लेती थीं ।
अब वह टीवी के सामने मुँह खोलकर बताती है स्पष्ट है कि वह बेखौफ हुई हैं इन
सबका एक कारण टीवी पर प्रसारित होने वाली धारावाहिक भी हैं । अब वह आधुनिक लड़की
हमें गली, मुहल्ले हर जगह देखने को मिल रही हैं जिसको कुछ समय पहले तक ढूँढ़ना
आसान नहीं था । इस नई लड़की को टीवी ने बनाया हैं वह अधिक सचेत और प्रदर्शन प्रिय
हैं । वह अपने छवि के प्रति अधिक चिंतित हैं । कास्मेटि उधोग, अपने हक और बराबरी
का दावा करने वाली कहानियों ने उसे बनाया हैं । वह महाभारत, रामायण, श्री कृष्ण को
देखकर सती अनुसूया नही बनी हैं, उनकी रोल माँडल कैटरीना, करीना व प्रियंका चोपड़ा
जैसी अभिनेत्रियाँ रही है वह उनकी तरह ही बनना चाहती हैं ।
टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले धारावाहिकों का सकारात्मक असर पुरूषों पर भी
हो रहा हैं । वह “हैल्थ
फ्रिक” हुए हैं । उन्हे गुड हैल्थ शो, माई जिम जैसे
धारावाहिक लुभाते हैं।वर्तमान समय के धारावाहिकों में जिस प्रकार से पुरूषों के
चरित्र तथा फिटनेस को फोकस कर दिखाया जाता हैं वह भी पुरूषों को अपने प्रति जागरूक
होने का कार्य करता है ।
टीवी का सबसे ज्यादा असर ग्रहण करने
वाला वर्ग बच्चों का ही हैं । बच्चों का मस्तिष्क व ह्रदय दोनों ही कोमल
होते है। उन पर टीवी पर प्रसारित होने वाले धारावाहिकों का असर जल्द ही हो जाता
हैं। उदाहरण के लिए अगर माँ ने बच्चे से कहा कि दूध ,पानी हमारी सेहत के लिए अच्छा
है तो कोई असर नही पड़ेगा परन्तु यहीं बात अगर शक्तिमान टीवी में कहेगा तो दुध को
पंसद न करने वाले बहुत से बच्चो को दूध अच्छा लगने लगेगा ।
टीवी पर प्रसारित होने वाले धारावाहिकों की वजह से वह अपनी जरूरतों की चीजो को
पहचानने लगे हैं आज वह बालवीर बनना चाहते है । वह बालवीर बन सकते है इस बात का आभास
उन्हे टीवी ही कराता हैं ।
टीवी ने उन समाजों को ताकत का एहसास कराया है जो परंपरागत समाज से बाहर कर दिए
गए थे । इसमे दलित और स्त्रीं जैसे वर्ग शामिल हैं टीवी घरेलू मामला है जो यह
एहसास कराता है कि जो आप देख रहे है वह आपका जीवन है इसलिए उसे देखते हुए दर्शक
उसकी छवियों जैसा बनना चहता है। टीवी कामना को खोलने और निर्बध करने वाला माध्यम
हैं । जब एक दलित अपने यहाँ टीवी देख सकता है और वही सब कुछ देख सकता जो उच्च
जातियाँ देख रही है ।
टीवी के प्रभाव के कारण ही आज सूचनाओं का तेजी से विस्तार हो रहा हैं समाज की
जरूरत हैं सूचना , सूचना के माध्यम से ही समाज का विकास किया जाता हैं । आज भारतीय
समाज में अस्थिरता का बड़ा कारण और गणतंत्र के बने रहने वाले का भी एक बड़ा कारण
टीवी को कहा जा सकता हैं। अब न्याय सहने वाले कम हो रहे हैं, अन्याय के खिलाफ
लड़ने वाले ज़्यादा हो रहे है । आज लोगों को न्यायपालिका और कार्यपालिका से ज्यादा
भरोसा टेलीविजन पर हैं ।
हम देखते है राजनीतिक एंव आर्थिक सूचनाओं के लिए अखबार था, मनोरंजन के लिए
सिनेमा था, निजी बातचीत एंव व्यपार के लिए टैलिग्राफी और टेलीफोन थे । लेकिन आज इन
सबका स्थान टेलीविजन ने आसानी से ले लिया है या यू कहें कि इन सब कार्यों को टीवी
अकेले ही करता हैं । टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले धारावाहिक के कारण ही सैक्स
के प्रति युवाओं का नज़रिया बदला हैं । एड्स सूचना कार्यक्रमों , कोंडम सैनिटरी
नैपकिन के विज्ञापन ने युवा वर्ग के दृष्टिकोण बदल दिया हैं । वे अपने दोस्तो से
प्रेम के बारे में अधिक खुलकर बात करते दिखते हैं।
शिक्षा के क्षेत्र में तो टेलीविजन ने क्रांतिकारी परिर्वतन संभव किए है टीवी
ने कक्षा को घर – घर तक पहुँचा दिया अब टीवी के माध्यम से घर बैठे ही पढ़ाई की जा
सकता हैं । जब मार्शल मैकलूहान ने माध्यम को संदेश बताया था तो उनका मकसद शिक्षा
क्षेत्र से ही था । इसके अलावा टीवी पर कुछ ऐसे भी धारावाहिक हैं जो सामाजिक
कुरीतियों, सामायिक समस्याओं व पुरानी रूढ़िवादियों के संबधित विषय पर चर्चा करते
है ।
हिन्दी धारावाहिकों ने कथा को छापेखाने से उठाकर , निरक्षरों के बीच लाने का
काम किया हैं ,ध्यान से देखे तो उसे नया रूप , साज सज्जा, चरित्र रुपन देकर उसे
नया जीवन देने का कार्य किया हैं । धारावाहिकों की लोकप्रियता ही उसकी सफलता की
कहानी कहती हैं । धारावाहिकों के माध्यम से समाज ने बहुत कुछ सिखा हैं ।
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