टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले धारावाहिकों ने समाज को भ्रमित करने का कार्य
भी बड़ी चतुराई के साथ किया है हमारे देश मे जिस गति से पाश्चात्य सभ्यता ने अपने
पाँव पसारे है उसका जिम्मेदार कुछ हद तक टीवी भी हैं । आज लड़कियों के चेहरे पर
लाज व घूँघट के बदले मेकअप ने जगह ले ली हैं इन सब में धारावाहिकों की महत्वपूर्ण
भूमिका रही हैं। आज मनोरंजन करने के लिए डी जे और डिस्को का प्रचलन आ गया हैं जबकि
पहले लोग गुजराती गरबा, पंजाबी भगंडा करके अपना मनोरंजन करते थे ।
इसमें कोई दो राय नही है कि टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले हिन्दी
धारावाहिकों ने समाज की हर इकाई पर प्रभाव छोड़ा हैं । समाज की बदलती सोच का कहीं
न कहीं जिम्मेदार टीवी भी हैं । टेलीविजन आज पागल हाथी की तरह सब कुछ उखाड़ रहा है
जिसे हमने बहुत समय से बचाकर रखा था वो उन सभी संस्कृति को तोड़ने मे लगी हुई हैं
। उसके इस प्रभाव के कारण आज भारतीय समाज दिन के उजाले में भी किसी अंधकार की तरफ
गुम होता जा रहा हैं इसका अर्थ यह हुआ कि धारावाहिक निर्माताओं को नैतिकता से नही
बल्कि अपनी जेबें भरने से मतलब होता हैं ।
टीवी की ताकत लगातार बढ़ती ही जा रही हैं ,टीवी समाज में रहने वीले हर वर्ग को
छुता है । चाहे वो बच्चा हो, महिलाएँ हो, युवाओं को, अपराधियों को, वैश्याओं को,
बुजुर्ग आदि । टेलीविजन का समाज
पर प्रभाव देखना हो तो दर्शक के बदलते व्यवहार और जीवन शैली ,में देखा जा सकता
हैं.। आज हर कोई धारावाहिकों में अभिनय करने वाले अभिनेता ,अभिनेत्रियों की तरह
रहना , बोलना तथा कपड़े पहनना चाहते हैं उनकी बनावटी बातों और मूल्यों को सच मानने
लगी हैं । वह यह नही जानती कि यह मूल्य धारावाहिक को दिशा देने के लिए निर्माता द्वारा
बनाया जाता हैं जो केवल देखने में ही अच्छा लगता हैं क्योंकि इस तरह का जीवन रीयल
लाईफ में जीना संभव नही हैं ।
टेलीविजन का नकारात्मक प्रभाव सबसे ज्यादा बच्चों पर ही देखने को मिलते हैं
,आजकल टीवी के कारण बच्चे फैटंसी की दुनिया में रहने लगे हैं। बालवीर, सोनपरी,
शक्तिमान , शाका-लाका बूम बूम, विकराल और गबराल, हातिम, अलिफ लैला आदि ऐसी
धारावाहिकें बच्चों को ऐसे चरित्रों से मिलाता हैं जो काल्पनिक हैं और बच्चों के
कोमल ह्रदय और मस्तिष्क पर प्रभाव डालते हैं।
कुछ बच्चें जहाँ धारावाहिकों में दिखाये गए घटनाओं को सच मानकर अपने जान से
हाथ धो बैठे हैं उदाहरण के तौर पर शक्तिमान को देखते हुए कई बच्चों ने ठीक उसी
प्रकार किया जैसे कि उसके अंदर दिखाया जाता हैं ,कुछ बच्चों ने अपने शरीर पर
मिट्टी का तेल डालकर आग लगा ली और शक्तिमान का इंतजार करने लगे उन्हे पूरा भरोसा
था कि शक्तिमान उन्हें अवश्य बचा लेगा और इसी चक्कर में वह अपने जान से हाथ धो
बैठे । ये तमाम उदाहरण नकारात्मक प्रभाव के उदाहरण ही हैं ।
बच्चों का चिढ़चिढ़ा और अवज्ञाकारी होने में भी टीवी का ही हाथ हैं, वह कम से कम 4-5 घंटे टीवी देखते हैं
जिस कारण वह पढ़ाई पर पूरा ध्यान नही दे पाते न ही अपना गृहकार्य पूरा कर पाते है
। वह विज्ञापनों को रट लेते है ,किताबो के चैप्टर्स से ज्यादा उन्हें धारावाहिकों
और उनके चरित्रों के नाम याद होते हैं । वह टीवी देखकर अपनी आँखे भी खराब कर लेते
हैं जो कि बाद में उनके भविष्य के लिए नुकसानदेय साबित होता हैं ।
अपराध के बढ़ने का कारण भी कहीं न कहीं टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले
धारावाहिक हैं । सी आई डी, अपराधी कोन, सावधान इंडिया, क्राईम पैट्रोल आदि जैसे
धारावाहिक कही न कही मनोरंजन के साथ – साथ जाने-अनजाने अपराधियों को अपराध करने के
नए-नए तरीकों तथा योजनाओं से अवगत कराता हैं ।
यह विवेचना टीवी पर प्रसारित होने वाले औसत से ज्यादा प्रसारित होने वाले
धारावाहिकों को आधार पर रख कर ली गई है परन्तु आज भी कुछ धारावाहिक ऐसे है जो सामाजिक
दायित्वों को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं।