टेलीविजन के लिए धारावाहिक बनाने के इच्छुक ज्यादातर लोग हास्य से संबधित अपना
विषय रखना पंसद करते हैं । जो लोग पहले ही कोई न कोई धारावाहिक बना चुके है वो भी
अब काँमेडी पर काम करना चाहते हैं, जो अभी सोच-विचार के स्तर पर है उन्हें भी एक
विचार सबसे ज्यादा आकर्षित कर रहा है वह हैं काँमेडी धारावाहिक बनाया जाए ।
ऐसा क्यों है ? क्या
काँमेडी सीरियल सबसे ज्यादा सफल होते हैं? या हास्य पर लिखना
दूसरे विषयों की अपेक्षा अधिक आसान होती हैं? दरअसल ये दोनों
ही धारणाएं गलत हैं तो फिर क्यों ज्यादातर लेखक, खासतौर से नए लेखक काँमेडी की ओर
आकर्षित होते हैं।
इसकी वजह यह है कि हमारे यहां आमतौर पर हास्य की धारणा ही कुछ अजीब सी है।
सिनेमा ने इन गलत धारणाओं को हवा दी हैं । कोई आदमी या औरत अगर ज्यादा मोटा है तो
वह हमारे यहां हास्य का पात्र बन जाता हैं जबकि इतना तो सभी जानते है कि कोई
जानबूझकर अपने शरीर का संतुलन अनुपात से अधिक होने नही देना चाहता । बहुत छोटा या
ज्यादा लंबे कद का आदमी , हकलाने वाला ,भेंडी आंखो वाला, ऊंचा सुनने वाला ये सभी
हँसी के पात्र बना दिये जाते हैं जबकि ये सभी दया और सहानुभूति के पात्र हैं।
सड़क चलता कोई आदमी अगर केले के छिलके पर पांव पड़ जाने से गिर जाता है तो
इसमें हँसने जैसी क्या बात हैं? लेकिन
होता यह है कि जब लोग लिखना शुरू करते हैं और हास्य के संबध में जिनकी धारणा
स्वस्थ नहीं होती, उन्हें ,ही लगता है कि एक बहरे और एक हकले को बातचीत करता दिखा
दो, हास्य अपने आप उपज जाएगा । यह बात शायद सही भी हो सकती हैं लेकिन उपरोक्त परिस्थितियों
में दर्शकों का एक नया खास वर्ग ही हंसेगा । बाकियों को या समझदारों को उन पात्रों
की उस कमजोरी के प्रति सहानुभूति होगी जो उन्हें प्रकृति से मिली है, जिसके लिए वो
खुद दोषी नही हैं ।
जब आप इस तरह की भोंडी स्थितियों को हास्य के दायरे से बाहर रख कर सोचना शुरू
करेंगे तो मालूम होगा कि किसी को हंसाना उतना आसान नही है जितना मालूम पड़ता हैं
इसलिए यह कहा जाता है कि किसी को रूला सकना आसन है और हंसाना बेहद मुश्किल । हास्य
आसन होने की धारणा इस वजह से भी बनती है कि जब किसी अन्य विषय का धारावाहिक चल रहा
हो ,तब बीच में कोई समान्य सा संवाद या हास्य की कोई समान्य सी स्थिती भी हंसी का
ठहाका पैदा कर सकती हैं । तब लगता हैं कि इस तरह के हांस्य संवाद तो लगातार दिए जा
सकते हैं या ऐसी हास्य संबधी परिस्थिति लगातार रची जा सकती है लेकिन जब बात इस “लगातार” की आ जाती है
, तब असलियत पता चलती हैं ।
एक के बाद दूसरी और दूसरी के बाद तीसरी,चौथी तक तो गाड़ी ठीक-ठाक चल जाती है
लेकिन पांचवी के बाद जब छठी सोचना मुश्किल हो जाता है , तब लेखक के हाथ पांव फूलने
लगते हैं क्योंकि उसने तो एक दो नहीं सीरीज की सीरीज देने की हामी भर रखी हैं।
इस कठिनाई के बावजूद, हास्य धारावाहिक बनते ही हैं और कुछ अपार सफल भी होते है
जैसा कि हम सब टीवी पर प्रसारित धारावाहिक तारक मेहता का उल्टा चश्मा को देखते हैं
जिसकी लोकप्रियता दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही हैं । इसका मतलब यह है कि हास्य के
लिए लेखक में विशिष्ट पकड़ होनी चाहिए । यह सब पकड़ पैदा नही की जा सकती ,किसी हद
तक कुदरती ही होता हैं । फिर भी, मेहनत से क्या नहीं किया जा सकता ? जब हास्य में स्वभाविक रूप से बहाव नहीं
आता , तब उसे रचना पड़ता है। रचने का मतलब यह कि एक के बाद दुसरे संवाद में पंच
आते रहे, हास्य फूटता रहे, इसके लिए सप्रयास लिखना पड़ता हैं ।
सप्रयास का मतलब , चार- पांच – सात संवाद लिखे जाये फिर देखा जायें कि कौन -
सा सबसे सटीक बैठता हैं । इस तरह लिखना बड़ा परिश्रम साध्य होता है लेकिन लेखन को
प्रभावशाली बनाना है तो मेहनत से बचने की बात तो सोची ही नही जा सकती । एक लाइन के
पीछे चार पांच लाइनें कैंसिल करने की यह प्रक्रिया लेखक को दुविधा में डालने वाली
भी होती हैं ।
कई बार यह गलतफहमी भी काम करती है कि हास्य विषय हो और अच्छे हास्य कलाकार
उसमें काम कर रहें हो तो लेखक का आधा काम आसान हो जाता है क्योकि उन्हे अगर थोड़ा
बहुत इशारा भी मिल जायें तो बाकी वो अपनी हरकतों और मौके पर स्वंय जोड़ दिए गए
संवादों से शब्दों को सुधार कर हास्य पैदा कर सकते हैं । लेकिन यह धरणा पूरी
तरह गलत हैं । हास्य कलाकार अपने अभिनय से
उन परिस्थितियों में जान फूंक सकते हैं जो कागज पर जींवत हैं लेकिन वे कुछ नहीं
में से कुछ क्रिएट कर दें, यह उनके लिए मुमकिन नहीं । उनका क्षेत्र लेखन नहीं,
अभिनय हैं ।
काँमेडी लेखक के तौर पर आप इस तरह का आधा-अधूरा काम करके सफल नहीं हो सकते ।
आप जो पटकथा टेलीविजन सीरियल के लिए लिखें, उसका एक-एक शब्द इस नजर से नापा तोला
हुआ होना चाहिए कि दर्शक पर उसका क्या प्रभाव पड़ेगा । जब आप खुद उस अपने सोचे हुए
प्रभाव के बारे में आश्वस्त होंगे, तभी आप निर्देशक और अभिनेता को उसमें चार चाँद
लगाने का अवसर दें सकेंगें।
इस स्थिति में भी आपको दो चार होना पड़ सकता है कि जिस स्थिति को आपने परम
हास्यजनक मान कर लिखा, वह एकदम सपाट निकल जायें। इसलिए जाँच परख जरा ज्यादा कड़ी
होनी चाहिए । यह भी समझ लेना चाहिए कि ऐसा क्यों होता हैं? किसी जगह पर हास्य के लिए बहुत सी
परिस्थितियाँ सहयोगी होती हैं । परिवार या दोस्तो के बीच हंसी खुशी के क्षणों में
सभी इतने अच्छे मूड में होते हैं कि जरा-जरा सी बात पर हंसी फूट पड़ती हैं ।
ऊपरी तौर पर देखने में यह लगता हैं कि जो चीज हंसाए- वह काँमेडी । कभी हास्य
कलाकार की हरकत, कभी चुटकुला , कभी गलत पहचान की वजह से उपजा हास्य ,कभी व्यंग जो
आए, उसे चलाते रहो । लेकिन जब आप हास्य धारावाहिक लिखने जा रहो तो हास्य पर कुछ
गंभीर विचार कर लेना आपके लिए उपयुक्त होगा । यह जानना बेहद जरूरी हो जाता है कि
हास्य कितनी तरह से उपज सकता हैं, इसे आप एक वर्गीकरण के माध्यम से जल्दी तथा
आसानी से समझ सकते हैं ।
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